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१.
मैं थोडा उत्तेजित हूँ,
दो अक्टूबर !
गाँधी का जन्मदिन
समाधि पर फूल चढाने
और कुछ क्षण शांत
मौन खडा सोचता,
"क्या यहाँ कभी कोई आता भी है और भी किसी दिन?"
शायद ! गाँधी कि याद में
"गाँधी" टंका रह गया है?
या फिर गाँधी के मरने के बाद,
हे! राम
कुछ ज्यादा ही प्रेम हो गया है?
===========================
२.
जल रहा है भारत,
जल रहें हैं गाँधी के सपने,
किसने लगायी यह खुशियों में
यह आग?
कितने विभाजन?
कितने आपातकाल?
कितने गोधरा?
और कितने अयोध्या?
क्यूँ है छदम-धर्म निरपेक्षता?
क्यूँ है, तू बहुजन?
तू समाजवादी?
तू ठाकुर?
तू ब्राह्मण?
और तू मुसलमाँ?
क्यूँ नहीं हैं सब अपने?
अब तो ....
जल रहा है भारत....
जल रहे हैं गाँधी के सपने.............
शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009
गाँधी-स्मृति में......
१.
मैं थोडा उत्तेजित हूँ,
दो अक्टूबर !
गाँधी का जन्मदिन
समाधि पर फूल चढाने
और कुछ क्षण शांत
मौन खडा सोचता,
"क्या यहाँ कभी कोई आता भी है और भी किसी दिन?"
शायद ! गाँधी कि याद में
"गाँधी" टंका रह गया है?
या फिर गाँधी के मरने के बाद,
हे! राम
कुछ ज्यादा ही प्रेम हो गया है?
===========================
२.
जल रहा है भारत,
जल रहें हैं गाँधी के सपने,
किसने लगायी यह खुशियों में
यह आग?
कितने विभाजन?
कितने आपातकाल?
कितने गोधरा?
और कितने अयोध्या?
क्यूँ है छदम-धर्म निरपेक्षता?
क्यूँ है, तू बहुजन?
तू समाजवादी?
तू ठाकुर?
तू ब्राह्मण?
और तू मुसलमाँ?
क्यूँ नहीं हैं सब अपने?
अब तो ....
जल रहा है भारत....
जल रहे हैं गाँधी के सपने.............
मेरे बारे में
- महफूज़ अली (Mahfooz Ali)
- पेशे से प्रवक्ता और अपना व्यापार. मैंने गोरखपुर विश्वविद्यालय से एम्.कॉम व डॉ. राम मनोहर लोहिया विश्वविद्यालय,फैजाबाद से एम्.ए.(अर्थशास्त्र) तथा पूर्वांचल विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि ली है. I.G.N.O.U. से सन २००५ में PGJMC किया और सन् 2007 में MBA किया. पूर्णकालिक रूप से अपना व्यापार भी देख रहा हूं व शौकिया तौर पर कई कालेजों में भी अतिथि प्रवक्ता के रूप में अपनी सेवाएं देता हूं. पढ़ना और पढ़ाना मेरा शौक़ है. अंग्रेज़ी में मुझे मेरी कविता 'For a missing child' के लिए अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है. मेरी अंग्रेजी कविताओं का संकलन 'Eternal Portraits' के नाम से बाज़ार में उपलब्ध है,जो की Penguin Publishers द्वारा प्रकाशित है. अंग्रेजी में मैंने अब तक क़रीब 2600 कविताएं लिखी हैं. हंस, वागर्थ, कादम्बिनी से होते हुए ...अंतर्राष्ट्रीय हिंदी मासिक पत्रिका 'पुरवाई' जो की लन्दन से प्रकाशित होती है ...में प्रकाशित हुआ, तबसे हिंदी का सफ़र जारी है... मेरी हिंदी कविताओं का संकलन 'सूखी बारिश' जो की सन् 2006 में मुदित प्रकाशन से प्रकाशित है... मैं करता हूं कि मेरा ब्लॉग मेरे पाठकों को ज़रूर अच्छा लगेगा... आपकी टिप्पणियां मेरा हौसला बढ़ाती हैं. इसलिए मेरी रचनाएं पढ़ने के बाद अपनी अमूल्य टिप्पणी ज़रूर दें.मेरा प्रमुख ब्लॉग 'लेखनी’ है.
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36 टिप्पणियाँ:
achhi kavita...
महफूज अली साहब आपका चिंतन सही है
बहुत ख़ूबसूरत कविता लिखा है आपने! पढ़कर अच्छा लगा! गाँधी जयंती की शुभकामनायें!
तू ब्राह्मण?
और तू मुसलमाँ?
क्यूँ नहीं हैं सब अपने?
===
यही तो बात है यह अंतर जब तक नही मिटेगा तब तक गाँधी जयंती मनाना सार्थक नही है.
बहुत सुन्दर
कितने विभाजन?
कितने आपातकाल?
कितने गोधरा?
और कितने अयोध्या?
क्यूँ है छदम-धर्म निरपेक्षता?
क्यूँ है, तू बहुजन?
तू समाजवादी?
तू ठाकुर?
तू ब्राह्मण?
और तू मुसलमाँ?
क्यूँ नहीं हैं सब अपने?
bahut sahi chintan.....bahut achcha likha hai.
लूट लिया नेताओं ने हमारे देश को, बिखेर कर रख दिया.
लेकिन हमें चाहिए कि हम कुर-आन की उस आयत पर अमल करें जिसे ईश्वर ने अपनी अंतिम पुस्तक में कहा है;
"आओ उस बात की तरफ़, जो हममें और तुममें यकसां (समान) हों"
सलीम खान
स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़ (swachchhsandesh.blogspot.com)
हमारी अन्जुमन {विश्व का प्रथम एवम् एकमात्र हिंदी इस्लामी सामुदायिक चिट्ठा}(hamarianjuman.blogspot.com)
गाँधी जी की याद में बहुत बढ़िया प्रस्तुति..धन्यवाद!!
बहुत प्यारी कविता!!!
मैं कोई कवि या शायर नहीं हूँ फिर भी इस कविता को पढ़ कर अनायास ही ये पंक्तिया बन गईं:
काश! सब अपने होते
इन्सां को इन्सां से प्यार होता!
भाई से भाई न लड़ता
प्यार से सारा कारोबार होता।
मज़हबी झगड़े न होते
खुदगर्जी का न व्यापार होता
नामोनिशां मिट जाता नफ़रत का
वतन हमारा गुल-ओ-गुलजार होता।
गाँधी जी की याद में बहुत बढ़िया
बहुत प्यारी कविता!!!
बढ़िया शब्दचित्रों के साथ धारदार व्यंग्य हैं।
बधाई!
इस रचना से उठते सवालों पर विचार करने की जरुरत है एक बेहतर भारत बनाने के लिए. बढ़िया रचना.
गाँधी जयंती की शुभकामनाएँ.
aapke sawaal sochne ko majboor kar rahe hain..
Kaash ki in sawaalon par amal bhi kare koi..
Gnadhi ji ke janmdivas par aapka yah tohfa unhein zaroor bhaaya hoga..
Badhai..
(Mayank ki banayi tasveer ka sahi sadupyog kiya hai aapne..dhanyawaad)
कितने विभाजन?
कितने आपातकाल?
कितने गोधरा?
और कितने अयोध्या?
क्यूँ है छदम-धर्म निरपेक्षता?
क्यूँ है, तू बहुजन?
तू समाजवादी?
तू ठाकुर?
तू ब्राह्मण?
और तू मुसलमाँ?
क्यूँ नहीं हैं सब अपने?
बहुत सही कहा है आओ हम लोग जितने भी कह सकें कि हम भारातीय हैं बस् आज के दिन कम से कम खुद से तो एक प्रण ली ही सकते हैं शुभकामनायें
बहुत ही सार्थक रचना । हमें फिर से सोचना ही पड़ेगा
।
बापू को नमन .... chinta jaayaz hai aapkee..
सार्थक रचना...
अच्छी रचना।
कुछ ज्यादा ही प्रेम हो गया है?nice
आपकी चिन्ता बिल्कुल जायज है। बहुत अनोखे अन्दाज से आपने सच्चाई को सामने रखा है। बहुत-बहुत बधाई आपको
bahut accha likha hai...par afsos hota hai ki 2 oct ko sab Gandhiji ko hi yaad karte hai Lal Bahadur Shastriji ko koi yaad bhi nahi karta.aaj sabne Gandhiji ke bare mai hi likha hai........shayad hum kafi logo ko bhul jate hai....kabhi Lal Bahadur Shastriji par bhi likhna......
Donon rachnayein bahut sarthak Gandhi jayanti par ....sach ko ukerti ....!!
bhai Gandhi ji ko shraddhanjali dene ka aapka andaaj bahut anukuul aur acchaa laga..aur aapaki bhavanon se shat-pratishat sahmat hun..bahut sateek rachna..!!
काश की गाँधी के विचारों को अमल में लाना इतना आसान होता ...
गाँधी जयंती पर अनमोल भेंट के लिए आभार ...!!
आइये हम मिलके इन सपनों को जलने से बचाएँ ...सिर्फ दुःख दर्द का बयान ना करें......रोज़ जीवन के केवल चंद लम्हें इस सपने को अर्पण करें.......!
काश कि हम हिन्दुस्तानी इन सब से ऊपर उठकर खुद की पहचान एक हिन्दुस्तानी के रूप में बना पाते ! अफ़सोस कि आज गांधी जयंती बच्चो के लिए एक छुट्टी का दिन, बडो के लिए एक फोर्मलिटी और इन हरामखोर नेतावो के लिए सरकारी खाते में हराम एक और दिन का चाय-नाश्ता करने का बहाना मात्र रह गया है !
आपकी चिंता जायज है।
वाकई किसे इस सबकी चिंता है?
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
बहुत ही खूबसूरत शब्दों में पिरोया अपने हर सच्चाई को, बधाई के साथ शुभकामनाएं ।
" acchi kavita hai mahfooz aapke bhavna ki kadr karte hai hum "
----- eksacchai { AAWAZ }
http://eksacchai.blogspot.com
achh rachna hai ....
बहुत अच्छा महफ़ूज भाई।
SACH MEIN AAJ GANDHI KE SAPNE JAL RAHE HAIN .... GAANHI KE NAM KI DUHI DE KAR SAB APNA APNA ULLOO SEEDHA KAR RAHE HAIN .... JAANDAAR LIOKHA HAI
बिलकुल सच कहा आपने -जल रहे हैं गांधी के सपने !
Gehra asar chodti hai dono hi rachnayen.
सोचने की बात तो ये है कि गाँधी जयंती के दिन हमारे पॉलिटीशियन लोग बोलते हैं कि हमें गाँधीजी के बताए रास्तों पर चलना चाहिए और ये भी भूल जाते हैं की गाँधीजी ने सदा सच बोलने को कहा था..
लड़ना मनुष्य की प्रकृति में है, महफूज़ भाई, अगर कोई न हो तो हम दीवारों से लडेंगे...गांधी जी ने उस प्रकृति पे विजय पायी थी, हमें भी गांधी हो जाने की जरूरत है...पर...
jagrookta paida karane wali rachna....sochane par vivash karati hui si....badhai
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