सोमवार, 20 फरवरी 2012

एक नालायक की आप-बीती और जड़ का प्रमाण: महफूज़


 सोचता हूँ  कि  अपने नाम के आगे डॉ. लगा लूं.. हाँ! भई.. आख़िर पी.एच.डी. किये हुए आज आठ साल हो गए हैं और अब तो दूसरी  पी.एच.डी.भी तैयार है. लेकिन पता नहीं क्यूँ अजीब लगता है? मेरा ऐसा मानना  है कि पी.एच.डी. नालायक लोग करते हैं, यही एक ऐसी क्वालिफिकेशन है जिसके बारे में कभी कोई सवाल नहीं होता. यही एक ऐसी क्वालिफिकेशन है जिसके लिए आपको पढना नहीं पड़ता सिर्फ अपने गाइड को तेल लगाते रहिये. यही एक ऐसी क्वालिफिकेशन है जिसके बारे में कभी किसी भी इंटरविउ में कोई सवाल नहीं होता आपसे सिर्फ रिसर्च मेथडोलॉजी पूछी जाती है. अगर कोई इतना ही इंटेलिजेंट होता है तो पी.एच.डी. नहीं करता. जिस प्रकार एक साहित्यकार (जो आखिरकार नालायक ही साबित होता है) को उसकी डेथ बेड पर साहित्य सम्मान दिया जाता है उसी प्रकार पी.एच.डी. आपकी क्वालिफिकेशन का अल्टीमेट सर्टिफिकेशन होती है. 

मेरी शक्ल मेडिकल डॉक्टर जैसी है. मैं जब भी लखनऊ के के.जी.एम.सी. मेडिकल कॉलेज जाता हूँ तो वहां के कई जूनियर मुझे सीनियर समझ लेते हैं और जहाँपनाह वाले अंदाज़ में तीन बार सलाम ठोंक देते हैं. मेरी सिचुएशन बहुत अजीब होती है तब. कई बार तो मुझे बहुत सारे पेशेंट्स डॉक्टर समझ कर घेर लेते  हैं.  अब तो मेडिकल कॉलेज में भी फाइनल इयर में मैनेजमेंट के एक-आध सब्जेक्ट्स पढ़ाए जाते हैं और जब मुझे अपना नाम डॉ. (महफूज़ अली) के साथ बताना पड़ता है तो मेरा चेहरा अजीब सा हो जाता है. मैं ख़ुद को बड़ा नालायक फील करता हूँ. सोचता हूँ अगर इतना ही इंटेलिजेंट होता तो भई पी.एच.डी. क्यूँ करता? 

अगर कोई बच्चा वाकई में इंटेलिजेंट होता है तो वो बारहवीं के बाद ही आई.आई.टी./मेडिकल/एस.सी.आर.ऐ./एन.डी.ऐ/या होटल मैनेजमेंट में निकल जायेगा. उसके बाद जो एवरेज होगा वो ग्रेजुएशन/पोस्ट ग्रेजुएशन  के बाद सी.डी.एस. / बैंक पी.ओ./ सिविल सर्विसेस/ लेक्चरार/या यू.जी.सी./गेट/मैट पास करके निकल जायेगा. जो इनमें से कुछ भी नहीं बन पायेगा वो और आगे पढ़ता हुआ पी.एच.डी. करेगा और फ़िर ज़िन्दगी भर भी कुछ नहीं करेगा. हमने तो भई यू.जी.सी. जे.आर.ऍफ़. लिया था और सिविल सर्विसेस में भी दो बार इंटरविउ तक पहुंचे थे. 

जब कोई बच्चा स्कूल टाइम से लेकर कॉलेज तक में नालायक होता है. हाई स्कूल और बारहवीं में घिस घास कर पास होता है... ना डॉक्टर बनने लायक होता है ना इंजिनियर, ना आई.ऐ.एस. बनने लायक होता है ना प्रोफ़ेसर, ना पौलिटीशियन बनने लायक होता है ना बिजनेसमैन, ना टीचर बनने लायक होता है ना चपरासी, ना लेखक बनने लायक होता है ना कवि. ऐसा बच्चा बड़ा होकर 'पत्रकार' बन जाता है ... या... किसी जागरण/ज़ेवियर/घोरहू-कतवारू  इंस्टीट्युट ऑफ़ मॉस कम्युनिकेशन टाईप के संस्था से डिप्लोमा लेकर 'एंकर' बन जाता है. 

वैसे मैं तो अपने  नाम के साथ नेट (इंटर) पर डॉ. इसीलिए नहीं लगाता हूँ कि कौन अपना बचपना ख़त्म करे. नोर्मल लाइफ में तो सीरियस ही रहना पड़ता है एक यही तो वर्चुयल दुनिया है जहाँ थोडा बहुत बचपना इस उम्र में भी दिखा सकता हूँ. 

इस उम्र से ध्यान में आया कि मैं हमेशा लोगों को सलाह दूंगा कि भई एक्सरसाइज़ ज़रूर किया करें और खाना बहुत सोच समझ कर खाएं . इससे क्या होता है ना कि आप ख़ुद ही अपनी उम्र को धोखा दे देंगे. अभी क्या हुआ ना कि लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ के मीटिंग में लंच के दौरान जब प्रज्ञा पाण्डेय जी, सुशीला पूरी जी, उषा राय जी और प्रज्ञा जी की एक बहुत ही अच्छी सहेली हैं किरण जी जो कि बहुत ही नामी साहित्यकार   हैं और हमेशा हंस/वागर्थ में छपती रहती हैं (इन्होने मुझे बचवा कह कर पुकारा था) को जब मैंने अपनी उम्र बताई तो सब थोड़ी देर के लिए परेशान हो गईं थीं और मैं बहुत खुश. सब लोग सोचते होंगे मुझे कि कितना आत्ममुग्ध इन्सान है? ख़ैर.....


जिन दिनों नहीं कुछ लिख रहा था... तो... उन दिनों कविता लिखी थी. अब लिखी तो कई सारी हैं... लेकिन ब्लॉग पर धीरे धीरे रोज़मर्रा ज़िन्दगी में से टाइम निकाल कर डाल रहा हूँ. तो प्लीज़ ...यू ऑल आर रिक्वेस्टेड टू हैव अ स्लाईट ग्लैन्स ओवर माय कविता इन हिंदी

जड़ का प्रमाण
-----------------

यह नींद भी कितनी अजीब है,
पलकें बाहर से बंद कर लो
और आँखें 
अंदर खुल जातीं हैं. 
मैं अपनी नींद के भीतर 
सालों से जागते हुए 
देख रहा हूँ ----
एक अंकुर को फूटते हुए
पर मैं जड़ बनने को तैयार नहीं हूँ ....
कब तक मैं भीतर रह कर 
औरों को इंधन पहुंचाता रहूँगा?
जड़ का प्रमाण ही यही है,
कि पौधा फलों को 
जन्म देकर 
उन्हें जवानी तक पहुंचाने में दम तोड़ 
देता है. 

(c) महफूज़ अली 

इंधन=Fuel
प्रमाण=Evidence
जवानी=youth
अंकुर=Baby Plant  (यह कुछ हिंदी के टफ वर्ड्स हैं जिन्हें मुझे डिक्शनरी में देखने पड़े हैं)

उम्मीद है कि कविता अच्छी लगी होगी. पिछले साल अगस्त में लिखी थी.  अब भई.. मेरा मनपसंद गाना देखिये भी और सुनिए भी.


बुधवार, 15 फरवरी 2012

फलसफा रिश्तों का : महफूज़ (Mahfooz)



मुझे ऐसा लगता है कि हमारे ज़िन्दगी में एक वक़्त ऐसा आता है कि जितने भी गैर ज़रूरी चीज़ें या लोग हैं वो अपने आप फिल्टर हो जाते हैं. ऊपरवाला हमारे लिए हमेशा अच्छा ही सोचता है और वो खुद ही ऐसे लोगों को हमारे ज़िन्दगी से गायब कर देता है जो हमारे लिए आगे चल कर नुकसानदायक होंगे. ऊपरवाला हमें हमारी ज़िन्दगी में ऐसे बहुत से लोगों से मिलवाता है जिनसे हमें वो ज़िन्दगी का सबक सिखाता है. और फिर हमें किसी ऐसे से मिलवा देता है जो सिर्फ हमारे लिए ही बना होता है और हम ऐसी कोई गलती नहीं करते जो हमने अपने पिछले संबंधों में किये  थे. कोई ज़रूरी नहीं है कि जिससे वो हमें मिलवाये वो हमारा ज़िन्दगी भर का हो जाये , वो ऐसा भी कर सकता है कि उसे आपका हमसफ़र ना बना कर हमसाया बना देता है. 
(फ़ोटोज़ का ब्लॉग पोस्ट्स से कोई लेना देना नहीं है, आई डोन'ट वॉंट टू स्टील फ्रॉम गूगल विंक..विंक..)



रिश्तों का फलसफा....

कैरेक्टर हमेशा 
बिकता है 
बस बिकता और सिर्फ बिकता है.....
मोम जलता नहीं है 
पिघलता है 
और 
उसके बीच में फंसा हुआ 
धागा जलता है ....
जलता है 
और लगातार जलता है,
जब तक धागा जलता है 
मोम पिघलता रहता है. 

                  जैसे ही उसने केक काटा 
                     और मोमबत्ती बुझाई 
                   एक साल और कट गया 
                 और ज़िन्दगी एक बार और बुझ गयी 
                          कटने और बुझने की .....
                 शिकायत की कहानी है ज़िन्दगी.

मोम के बीच फंसी हुई ज़िन्दगी 
धागे की तरह धीरे धीरे जलती है 
और जिस्म ...
धागे के ख़त्म होने तक लगातार 
पिघलता है 
जब धागा पूरी तरह
जल जाता है तो
मोम .....
रिश्तों के डेस्क पर फैलता है
और 
पसर जाता है. 

(c) महफूज़ अली 


अब एक बहुत ही खूबसूरत गाना देखिये/सुनिए. बड़ा मज़ा आएगा, ऐसे गानों को आँख बंद करके सुनने में ही मज़ा आता है. दिस टाईप ऑफ़ सोंग इस ऑलवेज़ फॉर डेडिकेशन....


सोमवार, 13 फरवरी 2012

महिलायें सावधान: महफूज़


फेसबुक पर डॉ. मृणालिनी ने अपने स्टेटस पर जब यह डाला " ATTENTION ALL MY LADY FRIENDS....THERE ARE SOME CREEPS ON FACEBOOK LIKE HOW WE HAVE IN SOCIETY WHO ARE TRACKING MIDDLE AGED RICH WOMAN BEFRIENDING THEM BEING EMOTIONAL AND TALKING GOOD JUST TO EXPLOIT...IDENTIFY AND KICK THEM ON THEIR..Butttts.............."  तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ. उनसे पता चला कि ऐसा काफी फेसबुक और ब्लॉग की महिलाओं के साथ हुआ है. मैंने उन्हें बताया कि मैं भी ऐसी बहुत सी महिलाओं को जानता हूँ जिनके साथ ऐसा हुआ है. कुछ को तो मैने ही उन महिलाओं के कहने पर भगाया और कुछ को इसीलिए कुछ नहीं कह पाया क्यूंकि उन महिलाओं की डिग्निटी का सवाल था. अब सोचने वाली बात यह है कि आख़िर ऐसा होता क्यूँ है? क्या महिलायें गलत हैं? या फ़िर वो पुरुषों की ही गलती है? थोडा सोचने पर निष्कर्ष यही निकला यह सारी प्रॉब्लम साइकोलॉजिकल और इमोशनल है. मिडल एज में आ कर एक पॉइंट ऐसा आता है कि कुछ अलग की रिक्वायरमेंट होती है और वो अलग को पाने के उसमें महिलायें कुछ ऐसे पुरुषों के चक्कर में फंस जातीं है. ऐसे पुरुष भी बहुत शातिर किस्म के होते हैं, वो बातों के दौरान कमज़ोरी जान लेते हैं और फ़िर उसी कमज़ोर पॉइंट पर हिट करते हैं और महिला को इमोशनल औरा में लेकर सेक्सुअल और फाइनेंशियल बेनेफिट लेते हैं या लेने की कोशिश करते हैं. और जब यह दोनों ही फुल्फिल्मेंट नहीं होता है तो उस महिला को ब्लैकमेल या परेशान करते हैं.

मैंने वही सोचा कि क्यूँ ना एक ऐसी पोस्ट लिखी जाए और महिलाओं को यह बताया (सावधान किया) जाए कि इस प्रकार के पुरुषों की पहचान कैसे की जाए और इनसे कैसे बचा जाए? इस प्रकार के पुरुष कई तरह के हथकंडे अपनाते हैं महिलाओं को फांसने के लिए. आईये जाने वो कौन से पैंतरे चलते हैं जिससे कि महिला पूरी तरह से उनके जाल में आ जाये:---------
  • जब कोई पुरुष बिना मतलब में आपके प्रोफाइल और प्रोफाइल पिक्चर की तारीफ़ करे और यह कहे कि आप बहुत सुंदर हैं.
  • आपके शारीरिक अंगों जैसे आँखें, बाल, नाक इत्यादि की बेवजह तारीफ़ करे भले ही आप उतनी ख़ूबसूरत ना हों.
  • आपसे पारिवारिक जानकारी लेने की यूँ ही कोशिश करे. 
  • आपके किसी भी फ़ालतू लिखे हुए कविता, शे'र, कहानी, आपबीती की जमकर तारीफ़ करे और तारीफ में पास आने की कोशिश करे. 
  • आपको हिंदुस्तान का शेक्सपियर बताये.
  • आपकी किसी सहेली की आपसे बुराई करे और उस सहेली को आपसे लडवाए.
  • आपकी सुन्दरता की तारीफ़ किसी अंदाज़ में करे. 
  • अगर आपने गुड नाईट भी लिखा तो उस पर लम्बे चौड़े कमेन्ट दे. 
  • आपके पति या बच्चों की तारीफ़ करे. 
  • आपके फेसबुक में प्राइवेट लव मेसेजेज़ छोड़े. 
  • अपनी जवानी के समय की फ़ोटोज़ दिखाए. 
  • अपने बीस साल के बच्चे को पांच साल का बताये. 
  • अगर आपने कोई (वाहियात सी) किताब लिखी है उसकी बिना मतलब में आपसे बिना पूछे उसकी समीक्षा करने बैठ जाये. 
  • ज़बरदस्ती आपकी लिखी हुई  किताब की तारीफ़ करे. 
  • कोई जब यह कहे की आप बहुत अच्छा लिखती हैं .. मैं आपकी किताब छापना चाहता हूँ. (ऐसे पुरुषों से फ़ौरन यह सवाल करिए कि कितने पुरुषों की  किताब उसने छापी है?)
  • आपके शहर की तारीफ़ करे. 
  • जब कोई बिना मतलब में आपको साहित्यकार बोले. (साहित्यकार होते तो यहाँ नहीं होते जग में नाम होता)
  • कई अखबारों में काम करने वाले पुरुष महिलाओं की छपास की आदत को जानते हुए छापने की ज़िद करते हैं, ऐसे पुरुषों  से दूर रहिये. उनसे यही सवाल करिए कि भई अगर तू इतना ही इंटेलिजेंट होता तो कहीं और होता? 
  • कई पुरुष पत्रकार (नालायक) सिर्फ महिलाओं से ही बोलते हैं कि हम आपको छापेंगे. इनसे दूर रहिये.
  • कई ऐसे पुरुष भी मिलेंगे जो ऐसे अखबारों में काम करते हैं जिनका नाम भी कभी नहीं सुना होता है वो महिलाओं को छाप कर उन्हें पुदीने की झाड पर चढाते हैं. ऐसे लोगों से दूर रहिये. 
  • आपसे अपनी बीवी की बुराई करे. 
  • आपसे ख़ुद को कामदेव का अवतार बताये. 
  • ज़बरदस्ती सेक्सुअल टॉक्स पर आये. 
  • अपने और आपके ओरगेन को डिस्कस करने की कोशिश करे (बिना प्यार में इन्वोल्व हुए). 
  • आपको यह भी कहे कि कहीं देखा है.
  • ध्यान रहे बहूत कम महिलायें इंटेलिजेंट होतीं हैं और कोई पुरुष जब आपको इंटेलिजेंट बताये तो संभल जाएँ.
  • आपसे बात करते हुए अचानक रो पड़े और यह रोते रोते अपनी बीवी और बच्चों की बुराई करे और फ़िर यह भी कहे कि माँ याद आ गई. 
  • बात करते करते किसी गर्लफ्रेंड/बीवी को यह कहे कि वो मुझे छोड़ कर चली गई . 
  • अपनी बीवी को अपने मरे हुए भाई की बीवी बताये... और यह कहे रोते रोते कि मुझे मज़बूरी में भैया के मरने के बाद इससे शादी करनी पड़ी है,.  
  • कोई जब अपनी बीवी को लेस्बियन बताये. 
  • और अपनी प्रोफेशनल टेंशन को बार बार हाईलाईट करे. 
  • विदेशों में रहने वाली महिलाओं को टार्गेट कर उनसे पैसे डिमांड करे. 
  • मिडल एज में भी आपको स्वीट सिक्सटीन बताये. 
  • और ख़ुद को महफूज़ अली जैसा हैंडसम बताये. 
मैं ऐसा नहीं कहता कि सब पुरुष ऐसे होते हैं, ऐसी महिलायें भी होतीं हैं. कुछ महिलायें  भी पुरुषों को सेक्सुअल और फाइनेंशियल एडवांसमेंट  के लिए फांस्तीं है. तो ऐसी महिलाओं को उनकी मनचाही चीज़ देकर खुश रखे रहना चाहिए. उसमें पुरुषों का कुछ नहीं जाता है. जब सब म्यूचुयल है  तो कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए. चूंकि महिलाओं को परेशानी ज़्यादा होती है तो उपरोक्त बातें सिर्फ उन महिलाओं के लिए हैं. 

अब देखिये जो भी पुरुष महिलाओं पर जब भी मंडराता है तो समझ जाइये कि वो इरेक्टाइल डिसफंक्शन से ग्रसित है... वो अपना फ्रस्ट्रेशन हमेशा दूसरी महिलाओं से पींगे बढ़ा कर दूर करता है क्यूंकि उसकी बीवी उसकी सच्चाई जानती है और नेट पर रहने वाली महिला नहीं. कमज़ोर आदमी हमेशा महिलाओं के पास रहने की कोशिश करता है और गिर गिर के चापलूसी करता है. आम ज़िन्दगी में भी वही पुरुष महिलाओं को मारता है या चिल्लाता है जो फिजिकली कमज़ोर होता है, वो अपनी मर्दानगी ऐसे ही दिखाता है. सेम ऐसा ही नेट पर है देर रात तक जग कर महिलाओं के ब्लॉग पर और फेसबुक पर मंडराना और ज़बरदस्ती तारीफें करना उनका शगल होता है. अब यह महिलाओं के  ऊपर डिपेंड करता है कि वो कैसे ऐसे पुरुषों को हैंडल करतीं हैं? जब भी कोई पुरुष आस-पास मंडराए तो समझ जाईये कि बेचारा कोई खंभा नहीं उखाड़ सकता है, वो इस लायक ही नहीं होता है कि कुछ गाड़े या उखाड़े. इरेक्टाइल डिसफंक्शन से ग्रसित पुरुषों से जुड़ कर सिवाय फ्रस्ट्रेशन के कुछ नहीं मिलेगा. और जो नोर्मल मर्द होगा उसका बिहेवियर बहुत नोर्मल होगा.. ज़बरदस्ती तारीफ़ नहीं करेगा, अपने बीवी-बच्चों को ध्यान देने वाला होगा, और उसका एक टाइम शेड्यूल होगा नेट पर आने का ... वो आएगा चंद लोगों से मिलेगा बात करेगा और फ़िर सोने चले जायेगा. 
(भई, यह फोटो इसीलिए डाली है ताकि जिनको अभी मेरे ऊपर गुस्सा आ रहा होगा तो वो मुझे देख कर थोडा और फ्रस्टेट हो लें)

तो पूरा जिस्ट(सारांश) सेक्स पर ही टिका है. यह भी सोचने वाली बात है कि आख़िर हर सेक्सुअल ताक़त की दवाएं सिर्फ पुरुषों के लिए ही क्यूँ बनीं हैं? सोचियेगा ज़रा... 

आईये अब, अपना मनपसंद गाना सुनाता हूँ. ऊप्स ! दिखाता हूँ... मैं तो आजकल वैसे भी  ज़िन्दगी से बहुत प्यार करने लगा हूँ और जब हम खुश होते हैं तो हम गाने ज़रूर सुनते हैं.. 


शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

अब तो नदी के सूखने की संभावना ही नहीं है: महफूज़ (Mahfooz)

मुझे पता नहीं क्यूँ कविता करने से बहुत डर लगता है..... एक तो यह कि कोई पढ़ता नहीं है और जो पढ़ भी लेता है तो वो अपना दिमाग लगा कर उसके मतलब में अपने हिसाब से एनालिसिस कर उस कविता को तहस नहस कर देता है और फ़िर ऊपर से मेरे जैसे को हिंदी डिक्शनरी देखनी पड़ती है तो वो अलग हेडेक... अब इस कविता में ही मुझे नहीं पता था कि छोटे छोटे पत्थरों को क्या बोलते हैं बड़ी मुश्किल से पता चला कि कंकड़ भी बोलते हैं ... ऐसा नहीं है कि मुझे कंकड़ नहीं पता था ...पता तो था लेकिन दिमाग़ में नहीं आ रहा था. अंग्रेज़ी सोचने और खाने का यही हाल होता है. 

अभी समीर लाल जी ने मुझे दोबारा ब्लॉग्गिंग करते देख कर कहा "वाह! ड्रैगन बैक इन एक्शन" .... मुझे यह टाइटल बहुत पसंद आया.. कितने डाइनामिक लगते हैं ऐसे टाइटल्ज़ .... कितनी एनेर्जी भर देते हैं... सो मैनलीहुड...  

           कविता से याद आया कि क्या हुआ ना फेसबुक पर एक महिला हैं उन्होंने अपनी वाल (Wall) पर किसी दूसरे कवि की कविता छाप दी और ढाई सौ कमेन्ट पा गईं... उस कवि ने उनकी यह गलती (चोरी) अपने वाल (Wall) पर सबको बता दी, अब उन महिला का चेहरा देखने लायक था. अब वो अपना फ्रस्ट्रेशन कैसे निकालतीं तो उन्होंने क्या किया कि पता नहीं कहाँ कहाँ से कैसी कैसी फोटो खोज कर अपने वाल पर डालनी शुरू की कि उनके पड़दादा फलाने साहित्यकार थे, तो दादा ने रामायण लिखी थी उन्होंने ही तमाम देवी देवताओं को वर्ल्ड फेमस किया था अगर उनके दादा नहीं होते तो आज इतने देवी देवता नहीं होते. मतलब फ्रस्ट्रेशन में उस महिला की यह हालत हो गई कि वो साइकी टाइप बिहेवियर करने लगीं. 

अरे मैडम .. अगर आपने चुरा भी लिया था तो उन ढाई सौ कमेंट्स के बीच में कहीं यह भी लिख देतीं कि यह कविता आपकी नहीं है. अब भई चोरी तो चोरी है. चोरी हमने भी की है लेकिन बता कर. 

अच्छा! मेरे एक चीज़ और समझ में नहीं आती कि आख़िर ऐसी क्या बात है कि फेसबुक के आते ही इतनी कवयित्रियाँ कहाँ से पैदा हो गईं है?  पुरुष तो फ़िर भी इतने कवि नहीं हैं लेकिन महिलाओं में देखता हूँ कि बाढ़ आ गई है और देखता हूँ कि लिंगुत्थान से वंचित ढेर सारे पुरुष जिनकी पत्नियां रात में  रोते हुए सो जातीं हैं वो वहां पर हर महिला के वाल पर रात में ख़ुशी-ख़ुशी और खुदखुशी में तारीफ़ करते नज़र आते हैं..  कमाल का फ्यूज़न है... और तारीफ़ भी ऐसी कि 'मैडम! हिंदुस्तान की शेक्सपियर आप ही हो".  फेसबुक देखकर ऐसा लगता है कि यह वो रेड लाईट एरिया है जहाँ हस्तमैथुन और दिमागी (साहित्यिक) मैथुन (Onanism) की अवैलिबिलीटी ज़्यादा है और दोनों में इमैजिनेशन का बहुत बड़ा रोल है.  आज सब लोग सोच रहे होंगे कि  मैं पगला गया हूँ .....क्या करूँ भई ?...आज लिटरली भड़ास निकाली है... भड़ास... हाईट हो गई थी. आईये भाई ... अब बियौंड थिंग्स .... इन्क्रेडिबली... स्ट्फ्स रिटन अबोव .... प्लीज़ हैव अ ग्लैन्स ओवर माय कविता.   
{आय ऍम वैरी सेल्फ ऑब्सेस्ड}

अब नदी के सूखने की संभावना नहीं है. 

कंकड़  का बनना 
रोक नहीं सकते
हम यह कर सकते हैं 
कि इन्हें पहाड़ ना बनने दें....

                    ज़रा सी नासमझी से 
                    पहाड़ नदी पर तैरने लगते हैं 
                    और
                    दोनों का चैन हराम हो जाता है.

नदी पहाड़ से डरती है 
कि वो उसके नीचे ना रह जाए....
पहाड़ को इस बात से तकलीफ 
कि उसका अटल अस्तित्व 
पानी पर तैर रहा है.....

                    इस सबके बावजूद 
                    तुम्हारे और मेरे बीच
                    में एक नदी बहती है 
                   जिसके सूखने की संभावना 
                          नहीं है...

क्यूंकि तुम ही 
वो नदी हो 
जो इन बनते हुए कंकड़ को 
अपने में समा लोगी.   

(c) महफूज़ अली
[हाइवे पर थोडा रुक गया था चाय पीने, सर्दी में थोड़ी धूप हो गयी थी]

कई लोग मुझे कहते हैं/ [कहतीं भी हैं] कि साला! तू बुड्ढा हो गया है.... इत्ते पुराने पुराने गाने खोज कर लाता है.... पुराने गानों की बात ही अलग है... लेस म्युज़िक मोर मीनिंग... मोर मीनिंग .... मोर सुकून...और सबसे बड़ी बात दिल और दिमाग को ठंडक का एहसास कराते... और उससे भी बड़ी बात ... बेस्ट वे ऑफ़ कम्युनिकेटिंग आवर वेज़ ऑफ़ फीलिंग्स... तो भई लीजिये पेश है आज का गाना... 

सोमवार, 9 जनवरी 2012

न्यू इयर रिज़ोल्यूशन का वादा और तुम्हारा अक्स... महफूज़


अपने न्यू इयर रिज़ोल्यूशन के मुताबिक़ फ़िर से हाज़िर हूँ. अब भाई लिखना तो है ही... लिखने से क्या होता है ना मन के अंदर का बहुत कुछ बाहर आ जाता है... नहीं तो अपने फीलिंग्स को या फ़िर विचार को सिर्फ एक बंद किताब में रखने से क्या फायदा.. हाँ? आजकल मैं ऋचा के द्वारा दी गई साइकोलॉजी की किताब (टी. मॉर्गन) पढने में लगा हुआ हूँ... (ऋचा द्विवेदी मेरी छोटी, लाडली बहन cum दोस्त है, और वर्ल्ड फेमस साइकोलॉजिस्ट है... पर ब्लॉगर नहीं है...ऋचा साइकोलॉजी समझाने के लिए थैंक्स... कभी कभी सोचता हूँ कि उपरवाला मेरे ऊपर कितना मेहरबान है... जो तुम मेरे हर अच्छे बुरे में साथ रही हो... अगर तुम नहीं होती ना... तो ज़िन्दगी इतनी आसान नहीं होती... एक तुम ही तो हो जो हर बार यही कहती हो... कि सर! मुझे मालूम है.. कि फ़िर से आप उठ खड़े होगे... चाहे वो कैसी भी सिचुएशन रही हो ... ज़िन्दगी के उथल पुथल, करियर का टेंशन या फ़िर रिश्तों की टूटन.... तुमने हमेशा मेरा साथ दिया... ) साइकोलॉजी पढने से एक बात तो है... आपको हर व्यक्ति एक सब्जेक्ट नज़र आएगा... और आपका मन उसी किताब के ऐकौर्डिंग उस व्यक्ति को स्टडी करने लगेगा.. अच्छा! रिश्तों की साइकोलॉजी को समझना भी एक कला है और यह कला हर कोई नहीं जानता .... अब रिश्तों की साइकोलॉजी को समझने में बहुत अच्छा लगता है... वो क्या है ना कि किसी भी रिश्ते को बनाये रखने के लिए हमें भी बहुत कुछ करना पड़ता है.... फ़िर चाहे वो कैसा भी रिश्ता हो... पर जो रिश्ता प्रेम ..मेरा मतलब लव का होता है ना... उसमें हमें काफी कुछ सीखने को मिलता है... साइकोलॉजी  यह कहती है कि प्यार हमें विनम्र, सहनशील, भरोसा और हाई सेल्फ एस्टीम वाला बनाता  है... मैंने भी एक कविता लिखी है... है तो यह प्रेम कविता... और इस कविता में मैंने यही बताया है.. कि हमें प्यार के रिश्तों को सहेज कर ही रखना चाहिए... (अगर प्यार है तो)... हमें कभी भी प्यार को फिसलने नहीं  देना चाहिए... खोने नहीं देना चाहिए....
[पीछे वंदना गुप्ता जी.. ...]

[यह अपना स्टायल है... ऐज़ पर अजय झा..]

[यहाँ भी ...]



[और यह तो मत पूछो.... यह पल मेरी ज़िन्दगी का सबसे खुशगवार पल था... है न ममा..?]
बस! यह फ़ोटोज़ भी ना बिना मतलब में ठेली गयी हैं... 


तुम्हारा अक्स ! ! ! ! !  

अब तुम्हारा अक्स
हमेशा के लिए 
मेरे ज़ेहन में बस गया है.
जिसे मैंने 
शब्दों के एल्बम में 
सहेज कर रख लिया है .... 

उन दिनों के लिए 
जब एल्बम पर 
धूल जम जाएगी,
और
अलमारी में जाले
पड़ जायेंगे...
तब हमारे सम्बन्ध 
हथेलियों के बीच से
साबुन की तरह फ़िसल 
कर  गिर
नहीं 
पायेंगें... 

वैसे रिश्तों/प्रेम पर बात करते हुए मुझे शे'अर याद आ रहा है... किसने लिखा है याद नहीं है, इतना याद है कि दर्शन कौर धनोए जी के वॉल पर पढ़ा था... और बड़ा अच्छा लगा था...कुछ यूँ हैं...

"बुलंदी पर पहुंचाने के लिए दुआ किसके लिए मांगूं?
जिसे सर पर बैठाता हूँ वही सर काट देता है."

अब यह तो प्रैक्टिकल है कि जिसे भी जिस भी रिश्ते में हम सर बैठाते हैं वही सर काट देता है. 

एक और बहुत ही मज़ेदार बात रहा हूँ... चलते चलते... पोस्ट भी काफी लम्बी हो रही है अब...अपने एक बहुत ही हम सबके प्यारे ब्लॉगर हैं... जो फादर ऑफ़ कंप्यूटर/इन्टरनेट टेक्निकलीटीज़ हैं, जिनके  दाढ़ी भी है... पगड़ी  भी पहनते हैं. उन्हें एक बार रात के दो बजे किसी महिला या महिला ब्लॉगर का फ़ोन आया और वो महिला उन्हें गहरी नींद से जगा कर पूछती है कि "कतिपय" का मतलब क्या होता है? बेचारे रात के दो बजे उनकी क्या हालत हुई सोचिये... और उस महिला की हालात सोचिये कि कितना परेशान हुई होगी ऐसी हिंदी से... अब भई मैं तो कहता हूँ ही ऐसी हिंदी या अंग्रेज़ी नहीं लिखनी चाहिए कि सामने वाला पढ़ कर आत्महत्या कर ले... 

अब भाई पोस्ट ख़त्म करता हूँ... खामख्वाह (अंग्रेजी में वीली-निल्ली) झेला रहा हूँ... जाते जाते मेरा एक और फेवरिट गाना तो देखते जाइये.. वो मैं कहता हूँ न की गीत हमारी ज़िन्दगी के बहुत बड़े हिस्से होते हैं और हमारी बात कहने का माध्यम... तो भाई हम अपनी बात कहे देते हैं ... तो लीजिये...


{एक शिकायत सबकी यह दूर करना चाहूँगा... कि फिलहाल मैं जब तक के फुरसत में नहीं आ जाता ... कमेन्ट बॉक्स नहीं खुलेगा... भई.... प्लीज़ बियर विद मी...}
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