रविवार, 20 मई 2012

और किसी को कुछ कहना या लिखना है तो लिख ले भाई..: महफूज़


काफी दिनों (दस दिनों के बाद) के बाद नेट पर आना हुआ है. वजह बहुत सिंपल सी थी कि मैं अपने अकैडमिक कौन्फेरेंस के लिए बाहर था और नेट के एक्सेस में नहीं था और इंटरनेश्नल रोमिंग की सुविधा मेरे मोबाइल में नहीं थी. लौट कर आया तो दिल्ली से सीधे अपने गृह नगर गोरखपुर चला गया वहां भी नेट का एक्सेस नहीं था कि गोरखपुर में फ़ोन आया कि भई मेरे खिलाफ कोई मेल सर्कुलेट कर रहा है. मैंने कहा कि भई करने दो क्या फर्क पड़ता है? तो मुझे बताया गया कि मेरी कविताओं के पब्लिकेशन पर कोई रिसर्च कर रहा है तो कोई मेरे फेसबुक प्रोफाइल  पर पी.एच.डी. कर रहा है. 

आज लौटा हूँ तो शिवम् ने मुझे वो मेल फॉरवर्ड की और किसी ब्लॉग का लिंक भी दिया. हालांकि मुझे कुछ  कहना तो नहीं है. लेकिन आज मैं ख़ुद अपने बारे में और भी ब्लॉग जगत को बताना चाहूँगा जो ब्लॉग जगत में खुशदीप भैया, शिवम्, ललित शर्मा, अनूप शुक्ला (फुरसतिया), शिखा (यह मेरे बारे सब कुछ जानतीं हैं), अंजू चौधरी, रश्मि रविजा, रेखा श्रीवास्तव , इंदु पूरी, अजित गुप्ता और पवन कुमार (आई.ऐ.एस) जानते हैं क्यूंकि यह सब मेरे घर आ चुके हैं. लेकिन आज जब वो मेल सर्कुलेट हो रही है तो मैं यह बता दूं भई कि मेरे बारे में जो भी जितना खोदेगा उतना ज़्यादा  निकलेगा. वो मेल कहती है कि मैंने अपने फेसबुक प्रोफाइल में MHRL नाम की संस्था का ख़ुद को चेयरमैन और सी.इ.ओ. बताया है. 

हाँ! भई बताया है.. लेकिन जिस MHRL का लिंक उस पर बन कर आ रहा था मैं उसका चेयरमैन नहीं हूँ और ना कभी था और ना कभी होऊंगा. बताइए किस फ्रस्ट्रेशन में उस आदमी ने क्या क्या खोज निकाला. अरे भई... मैं ख़ुद मल्टी-मिलियनेयर और इंडस्ट्रीयलिस्ट हूँ. मेरी अपनी मेडिकल कंपनी Medica Herbals and Research Laboratory (MHRL) है और मैं अपनी कंपनी का चेयरमैन, डाइरेक्टर, और सी.इ.ओ हूँ...(website link attached herewith the line) मेरी यह कंपनी पांच साल पुरानी है और इसकी वेबसाइट भी पांच साल पुरानी है.कभी बताया नहीं तो इतना कुछ लिख दिया...पता नहीं लोग क्यूँ सबको अपने जैसा ही गरीब गुरबा ही समझते हैं? मेरे और भी बहुत सारे बिज़नेस हैं. कानपुर और गोरखपुर में हमारे अब स्कूल चलते हैं (अभी हाल ही में शुरू किये हैं, इसका भी आईडिया एक बार अनूप शुक्ला जी ने ही दिया था). 

हमारी फैक्टरी की एक यूनिट कानपुर के दादानगर में भी लग रही है. अगर मेरे फेसबुक प्रोफाइल में MHRL का लिंक अगर कोई Mental Health Resource League for Mchenry County (MHRL) का  आ गया तो मैं क्या करूँ? मैंने कभी उस ओर ध्यान भी नहीं  दिया..ना ही कभी ध्यान गया. वो तो उन महाशय ने ध्यान दिलाया।..और वो महाशय चल पड़े मेरे बारे में लिखने बिना जांचे परखे, पर  एक चीज़ तो है कि यह पता चल गया कि चार अक्षर क्या क्या कर सकते हैं... और अक्षर क्या कमाल दिखा सकते हैं.? मेरी अपनी दवा कम्पनी है, मेरे कई सारे ठेके चलते हैं और इन सबके साथ मै एकेडेमीशियन भी हूँ. भई मैं यह बता दूं कि मुझे हमेशा टॉप पर रहने की आदत रही है.. मुझे सिविल सर्विस में आई.ऐ.एस. नहीं मिला था तो मैंने आई. ऐ.ऐ.एस (आई.ऐ.एस. अलाइड) की नौकरी छोड़ दी. और कोई नौकरी  मैं कर नहीं सकता था तो लेक्चरार, अब असोसिएट प्रोफ़ेसर (यही एक ऐसी नौकरी है जहाँ सब- ऑर्डिनेशन नहीं है) बन गया. इन सबके अलावा मैं एक रिफाइंड गुंडा भी हूँ. शारीरिक रूप से बहुत स्ट्रोंग हूँ तो दो-चार आदमियों को अकेले संभाल लेता हूँ. पहलवान भी हूँ, एजुकेशनिस्ट भी हूँ, बिजनेसमैन भी हूँ, राइटर भी हूँ और हैंडसम भी हूँ... और राजनीतिग्य भी हूँ. इसके बाद भी जितना खोदोगे उतना ज़्यादा निकलेगा.  अब भाई मुझे ऊपर वाले ने बहुत सुंदर बनाया है अच्छी शक्ल सूरत के साथ, अच्छा शरीर, और अच्छा पैसे वाला भी बनाया है तो एक अलग ऐटीट्युड तो रहेगा  ही रहेगा. और उन सबसे भी ऊपर बात यह है कि मैं रियल मर्द हूँ.. मुझे जिसे भी गाली देनी होती है मैं मुँह पर देता हूँ.. मुझे जिसे भी मारना होता है घर के अंदर घुस कर मारता हूँ (मारने से पहले सम्बंधित थाने में ख़बर कर दी जाती है की एक घंटे बाद आना). जो नामर्द होता है वो छिप कर और पीठ पीछे वार करता है. अरे भाई आमने सामने की लड़ाई लड़ो ...यह क्या बिना जाने समझे  किसी को भी चल पड़े लिखने.. मेरे बारे में जितना  भी लिखोगे उतना ही मुँह की खाओगे.. अभी यह जितना भी बताया हूँ ...ख़राब   तो लग रहा है मुझे यह सब बताने में क्यूंकि आज तक मैंने अपना  यह प्रोफाइल कभी बताया ही नहीं. वो बताइए मुझसे सावधान रहने की कोशिश करवा रहा है और ख़ुद गायब है. अरे मुझसे सावधान रहने की ज़रूरत इन्ही जैसे लोगों को है जिस दिन पता चल गया मुझे तो छोडूंगा नहीं. मुझे उन लोगों से लड़ने में ज़्यादा मज़ा आता है जो क्षत्रिय और मर्दों की तरह लड़ते हैं. 

भई! मैं तो बचपन से लेकर आज तक पोपुलर रहा हूँ और आने वाले दिनों में रहूँगा. जो भी मेरे बारे में जितना खोदेगा उतना ज़्यादा पायेगा. रही बात कोई मेरे कविताओं के बारे बात करने का ...तो वो मैं जर्मनी से लौट कर आने के बाद बताऊंगा. और भई मैं सरकारी मान्यता प्राप्त अंतरराष्ट्रीय रूप से प्रख्यात अंग्रेज़ी का राइटर हूँ.. हिंदी का नहीं हूँ.. हिंदी में तो यही सब बेवकूफियां करने आया हूँ..तो भाई ग़रीब गुरबों.. मुझसे चंदा लेने आओ.. और जितना खोद सकते हो उतना खोदो.. तुम मुझे जितना खोदोगे ... उतना नया महफूज़ सामने आएगा ...अच्छा है तुम्हारे लिखने  से मैं ही पोपुलर हो रहा हूँ.. और मुझे अपने बारे में और बताने के लिए मौका मिल रहा है.  वैसे तो मैं जानता हूँ कि यह कौन लोग हैं मेल सर्कुलेट करने वाले लेकिन बस मैं अब फ़ालतू लोगों के मुँह नहीं लगता. आफ्टर ऑल आई हैव सम लेवल..   खुशदीप भैया ने एक बार एक जोक लिखा था कि एक पूछता है दूसरे से कि मेरे पास ब्लॉग है, ऑरकुट है, फेसबुक है और ट्विट्टर है ...हईं! तुम्हारे पास क्या है? तो दूसरा जवाब देता है कि मेरे पास काम धंधा है. तो भाई लोगों मेरे पास भी काम धंधा है.. मैं यह सब ब्लॉग्गिंग जैसी फ़ालतू एक्टिविटी खाली टाइम में ही करता हूँ. कितना फ़ालतू टाइम है लोगों के पास .. बाप रे बाप.. 

मैं उस मेल करने वाले का शुक्र-गुज़ार हूँ कि मेरे पीठ पीछे मुझे और पोपुलर कर दिया.. और मुझे घर बैठे इतनी पोपुलैरिटी दिलवा दी कि बहुत सारे लोगों के मेल और फ़ोन आने लग गए. अभी यह जितना भी मैंने ख़ुद के बारे में बताया है वो भी कम है. अभी मैं फ़िर बाहर जा रहा हूँ.... अब देखता हूँ कि लौट कर और कितनी पौपुलैरिटी मिली है.. आज बिना मतलब में खुद के बारे में जो छिपाया हुआ था।...उसी के बारे में इतना मूंह खुलवा दिया।

अब मेरा फेवरिट गाना : 

मंगलवार, 8 मई 2012

फेसबुकिया बकवास, मेंटली कमज़ोर होना, और आज़ादी के घाव अब भी हरे हैं: महफूज़


मैं फेसबुक पर देखता हूँ कि कई लोगों ने देशभक्ति का ठेका ऐसे ले लिया है कि बाक़ी लोग उन लोगों के सिवाय कोई देशभक्त हैं ही नहीं. इन लोगों को पता नहीं कि ऐसे फेसबुक पर लिखने से देश और धर्म में कोई बदलाव नहीं आता उल्टा बेवकूफों की इमेज बनती है. देश सेवा समाज में और समाज के लिए अच्छे काम करने और अच्छे आचरण से बनती है. देश सेवा गरीबों और आम जनता में दुःख दर्द बांटने से होती है. आम जनता की समस्याओं को सौल्व करने से बनती है. यह ऐसे लोग हैं इन्हें लगता है कि फेसबुक पर लिख दिया और हो गई देश सेवा और तो और इनके लिए देशसेवा से मतलब है कि किसी भी पार्टी को गालियाँ दो. 

अरे भई.. इतने ही काबिल हो तो फील्ड में उतर कर काम करो, एम.पी./एम.एल.ऐ. बनकर समाज का भला ज़्यादा करो . कुछ लोगों को गलतफहमियां हो गईं हैं कि मिस्र में और एकाध देश में क्रान्ति फेसबुक से आई है और यह भी फेसबुक से ले आयेंगे, इन्हें यह नहीं पता कि फेसबुक ने सिर्फ कम्युनिकेट किया क्यूंकि उन देशों में सेल फोन्ज़ और बाक़ी मिडिया पर बैन हो गया था. और उस कंडीशन में फेसबुक ही काम में आया था. यह वो जाहिल हैं जो ख़ुद को बदलने की बजाये देश को बदलने की बात करते हैं लेकिन धर्म और जात-पात से ऊपर नहीं आ पाते. अरे! ख़ुद को बदल डालो देश अपने आप बदल जायेगा. फेसबुक से देशसेवा नहीं होती ना ही कोई सीरियसली लेता है. एक बात मैंने देखी है जब कोई भी आदमी अपनी ज़िन्दगी में कुछ नहीं कर पाता.. आम आदमी, कलर्क/मास्टर/कंप्यूटर ओपेरटर/किराना दुकानदार/पत्रकार या फ़िर कोई नगर निगम कर्मचारी टाइप या फ़िर सब चलता है टाइप बन कर रह जाता है, और बहुत ज़्यादा सब-ऑर्डिनेशन में ज़िन्दगी गुज़ारता है तो वो देश सेवा, देश बदलने और दूसरों को और सिस्टम को गालियाँ देने के सिवाय और कुछ नहीं कर पाता. 

जब आप  ज़िन्दगी  में नालायक रहोगे तो फ्रस्ट्रेशन में दूसरों की कमजोरियों निकालोगे....घरों में ताका -झांकी करोगे, और फ़िर और फ्रस्ट्रेट होगे. इनका हाल उस मर्द की तरह होता है जो सेक्सुअली कमज़ोर होता है. जब मर्द सेक्सुअली कमज़ोर होता है तो वो सबसे पहले अपने ही घरों की महिलाओं पर गुस्सा उतारेगा, बीवी को डांटेगा, उसे गालियाँ देगा और जब ज़्यादा मर्दानगी दिखानी होगी तो मारेगा. क्यूंकि सेक्सुअली कमज़ोर आदमी सिवाय मारने के और गरियाने के कुछ और कर नहीं सकता. सेक्सुअली कमज़ोर आदमी सबसे पहले महिलाओं पर ही मर्दानगी दिखाते है. इसी तरह इस टाइप के देशभक्त होते हैं.. इन्हें "देशभक्ति" कह कर और दूसरों को गाली देकर दिखानी पड़ती है.. बाप पदै ना जने और पूत शंख बजावे वाला हाल होता है इनका. अगर लिखने से ऐसे ही देश बदलता तो आज हर कोई लिख ही रहा होता. 

अब मेरी एक कविता:

आज़ादी के घाव अब भी हरे हैं.. 

देश जब आज़ाद होते हैं,
उनके जिस्म पर 
स्वतंत्रता प्राप्ति के घाव होते हैं,
उन्हें भरा जाता है,
मगर आज़ादी के घाव अब तक हरे हैं
क्यूंकि   
देश का चिकित्सक 
रोज़  घाव साफ़ करने के बाद भी 
उसमें कांच के टुकड़े रख देता है,
ताकि 
उसकी ज़रुरत 
बनी रहे. 
( ऐसे ही है यह फ़ोटोज़.. नथिंग टू डू विद द पोस्ट..)

आईये अब मेरा फेवरिट गाना (ग़ज़ल) देखा जाए।

बृहस्पतिवार, 3 मई 2012

दो ग़ज़लकार, ज़मीर का जिंदा न रहना और हम दोनों मिल के...ह्म्म्म...: महफूज़

आज हमारे घर मशहूर शायर फार्रूक जायसी साहब का आना हुआ. फार्रूक साहब एक्साइज़ कमिशनर भी हैं और शायरी का शौक़ भी रखते हैं और अक्सर मशहूर ग़ज़ल गायक प्रदीप श्रीवास्तव के साथ मंच साझा भी करते हैं. फारूक साहब की ग़ज़लों को दुनिया भर में काफी लोगों ने लयबद्ध किया है. हालांकि! मैंने उनकी ग़ज़लों को अब पढना शुरू किया है और ग़ज़लों की तासीर को समझा है. कहते हैं कि बिना उर्दू के ग़ज़ल बन ही नहीं सकती और फारूक साहब उर्दू के बहुत ही ज़हीन और मक़बूल शख्सियत हैं.  आज जब उनसे बातें हुई तो मैंने उन्हें अपनी हिंदी में लिखी हुई कवितायें दिखायीं हालांकि हिंदी में कुछ भी दिखाना वैसा ही होता है जैसा हाई स्कूल की सेकण्ड डिविज़न में मार्कशीट, मेरे जैसा आदमी शरमाता सकुचाता हुआ हिंदी की कवितायें दिखाता है. उन्होंने पहले ही सिरे से मेरी कविताओं को नकार दिया. उन्होंने कहा कि कविता वो होती है जो गाई जा सके. आपने जो लिखा है वो इन पैरा फॉर्म है. उन्हें गाया नहीं जा सकता. मैंने कहा कि यह भी एक विधा है और काफी लोग लिख रहे हैं. उन्होंने छूटते ही कहा कि आप जैसा आदमी भी काफी लोगों को फौलो करने लग गया है? मुझे इस जुमले पर शर्म तो आई फ़िर अपनी शर्म पर सफाई से काबू कर लिया.   उन्होंने बताया कि बिना भाव को छुए आप कैसे गद्य कविताओं को भी लयबद्ध कर सकते हैं. मैंने उनसे कहा कि अब से कोशिश रहेगी कि आपकी बताई विधा में लिखूं. हालांकि ! होता यह है कि कविता तभी होती है जब हमारे मन में भाव हो , एक फीलिंग हो. विधा वगैरह सब भाव के साथ सेकंडरी हो जातीं हैं. 

                  (फार्रूक साहब)
बात ग़ज़ल की चल रही है तो ग़ज़ल कहने और गायकी में सीमा गुप्ता जी का भी जवाब नहीं है. सीमा जी को मैं काफी अरसे से देख, पढ़ और सुन रहा हूँ और कई ग़ज़ल की बारीकियों को उनकी ग़ज़लों के माध्यम से समझा है. ग़ज़ल गायकी और एड्रेस में सीमा जी आज की तारीख में पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं और कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पुरुस्कारों से नवाजी जा चुकीं हैं. सीमा जी के बारे में नेक्स्ट पोस्ट में... फिलहाल तो उनकी किताब और प्रेजेंटेशन को पढ़ रहा हूँ.
    (सीमा जी जब टी. वी . पर थीं तो मैंने फोटो खींच ली थी)

अब एक मेरी कविता फ़िर से सबके  लिए.. 

ज़मीर का ज़िंदा ना रहना 
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आदमी की आँख 
जब उसके भीतर कहीं गिर जाती है 
तब बाहर से अंधा होने के बावजूद भी,
वो भीतर से देखने लगता है 
बाहर ठोकरें खाने के साथ 
उसे यह साफ़ दिखाई देने लगता है 
कि ज़्यादातर लोग 
क्यूँ ठोकरें खा रहे हैं? 
और कुछ लोग 
इन्ही सड़कों पर 
क्यूँ 
सुविधा से चल रहे हैं.. 

(c) महफूज़ अली 

फ़िर कह रहा हूँ कि हमारे ज़िन्दगी में गीत/गानों का बहुत महत्त्व है.. यह ना हों .. तो ज़िन्दगी वैसी ही है जैसे कार विदाउट स्टेयरिंग. यह भी हमारा एक मीडियम ऑफ़ कम्युनिकेशन/एक्प्रेशन ऑफ़ लव है. 

शनिवार, 28 अप्रैल 2012

शब्दों की मल्लिका का "क्षितिज" से आना (एक समीक्षा): महफूज़

शब्दों की सत्ता का कोई भले ही अस्तित्व ना हो लेकिन रचनाकार अपने लेखन से एक और (लेकिन) अलग संसार का निर्माण करता है कुछ ऐसा ही लेखन सुपरिचित कवयित्री और ब्लॉगर अंजू अनु चौधरी का है.
(God gifted beauty with brain)

अंजू द्वारा रचित किताब "क्षितिजा" कई सारे अनूठे रंगों का संगम है. जैसी निरंतरता की ज़रुरत एक कविता में होनी चाहिए वही निरंतरता अंजू के  "क्षितिजा" में है, कारण कि इसमें बहुत सारे पात्रों पर स्वतंत्र रूप से लिखी गईं लम्बी कवितायें संकलित हैं. प्रेम की पराकाष्ठा में निबद्ध अपने कवर पृष्ठ में ही अंजू लिखतीं हैं ====

                                                तुम कहते हो 
                                            निकलता हुआ चाँद 
                                              मुझे ही ताकता है 
                                             पर हर हर सांझ वो 
                                            मुझे बहुत रुलाता है 
                                             जब तुमसे बिछड़कर 
                                             जाने का वक़्त करीब 
                                                 आता है. (क्रमश:)
अपनी इस कविता में अंजू प्रेम के चरित्र की व्याख्या करतीं हैं. अंजू का प्रमुख उद्देश्य अपनी कविताओं में वर्णन करना नहीं, वरन अपने पात्रों का चित्रांकन करना है जो परंपरा द्वारा स्वीकृत मानदंडों तक ही सीमित नहीं है. अंजू ने आधुनिक बोध के परिप्रेक्ष्य में अपनी कविताओं में और उनके चरित्र में परिवर्तन करते हुए नवीन और मौलिक उदभावना की है. अंजू की कविताओं में अभिव्यंजना के साथ उनका वैचारिक चिंतन भी उभर कर आया है. एक नज़र देखिये:

                                                         गरीबी एक अभिशाप 
                                                          ज़िन्दगी का सबसे 
                                                              बड़ा संताप ....
                                                          लगता है मानवता 
                                                                मर गई
                                                       प्रलय का सामान सज रहा 
                                                              बाप बड़ा ना भैया
                                                              सबसे बड़ा रूपैया
                                                              पैसे की छनक पर
                                              हर गौरी गोरी की मुस्कान भी न्यौछावर 
                                                            दौलत की चमक पर 
                                                                   झुकते सब
                                                  करते सजदा भी सर झुका कर. (क्रमश:)

अंजू की कविताओं में सांगीतिक शब्दों का भी अजब मेला है, उनके अक्षर शब्द बनते हैं, शब्द लय बनते हैं, लय अवाज़ बनती है और इस तरह उनके मस्तिष्क के अन्धकार में लाखों विचार बनते हैं और अभिव्यक्ति के लिए टिमटिमाते हैं जिनसे नये धरातल बनते हैं. अपनी कविताओं में ही अंजू बहुत जल्दी ही अपनी जगह तलाश लेतीं हैं और यह जगह केवल अंजू की ही होती है. अंजू शहरी और देहाती दोनों की आधुनिकताओं को सार्थक शब्दों तक समझतीं हैं. 
अंजू आज के विकास क्रम की सीढियां चढ़ते हुए अपने वर्ग को भी धिक्कारतीं हैं. 

                                                                       आज मैंने एक ग़रीब को देखा 
                                                                             वो सूट-बूट, वो बाबू 
                                                                         सच में बहुत ग़रीब था 
                                                                              तभी तो वो उलझा था 
                                                                                 दो रुपये के लिए 
                                                                          एक रिक्शा वाले से... (क्रमश:)
अपनी इस कविता में अंजू विकास के प्रत्येक छंद सोपान को समझतीं हैं. अंजू की कवितायें अनुभूति की सीमा तोड़ कर अभिव्यक्त होने के लिए छटपटाती सी प्रतीत होतीं हैं. अंजू ने अपनी कविताओं की छटपटाहट को अनेक विशेषणों और क्रियाओं से जोड़ा है. अंजू की कई कवितायें एक अनिवार्य पाठ सी लगतीं हैं. 
(Attitude really matters... Classy....Graceful)
शैल्पिक दृष्टि से "क्षितिजा" की अर्थगर्भी, पात्रानुकूल भाषा, नवीन कल्पना, दृश्य योजना तथा प्रतीकों, बिम्बों से जीबंत रचना आदि से अंजू की सर्जनात्मक प्रतिभा का पता चलता है. सम्प्रेषण की सहजता के कारण इसमें काव्यास्वादन का संकट भी नहीं है. अंजू द्वारा रचित  "क्षितिजा" में कहीं भी काव्यत्व बाधा नहीं है और कविता कथा में परिवर्तित होती दिखाई देती है. अंजू की "क्षितिजा" में फिलहाल गंभीर आलोचनात्मक विमर्श होना बाक़ी है. पूरी  काव्य कृति पढने के लिए आपको "क्षितिजा" नीचे बताये हुए पते पर मिलेगी. "क्षितिजा" फ्लिप्कार्ट पर भी उपलब्ध है. 

पुस्तक:                 "क्षितिजा"
मूल्य:                     250 /-  
लेखक:                अंजू (अनु) चौधरी 
प्रकाशक:                   हिंद-युग्म
                       1 , जिया सराय, हौज़ ख़ास, 
                               नई दिल्ली -16  

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आभार: इस पोस्ट को पहले मैंने इंग्लिश में लिखा फ़िर अपनी अप्रवासी ब्लॉगर मित्र की मदद ली इसे हिंदी में लिखने के लिए. यह पोस्ट एक हफ्ते में लिखी गई है और पं. गिरिजा प्रसाद उपाध्याय जी (मेरे मित्र संतोष उपाध्याय के मामा जी और प्रख्यात अवधी साहित्यकार) के बिना पूरी नहीं हो पाती. इस पोस्ट में हिंदी के सारे शब्द  उन्ही के द्वारा ट्रांसलेटेड हैं. नहीं तो मेरे जैसा आदमी ऐसी टफ हिंदी नहीं लिख सकता (अभिव्यंजना,अर्थगर्भी, पात्रानुकूल भाषा, नवीन कल्पना जैसे शब्द मेरे ख्यालों में भी नहीं आ सकते कभी). फिलहाल मैं हिंदी सीख रहा हूँ. 
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अब ज़रा मेरा फेवरिट गाना देखिये... 

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

छोटा सा हादसा, अखबारों की लाचारगी और असहमति की बेवकूफी: महफूज़


आज एक छोटा सा हादसा हुआ. हुआ क्या कि मैं गोमतीनगर से सी.एम.एस. स्कूल के रास्ते  हज़रतगंज  जा रहा था कि विपुल खंड के मोड़ पर एक बुज़ुर्ग साहब के स्कूटी को मैंने टक्कर मार दी हालांकि टक्कर हलकी थी फ़िर भी वो बुज़ुर्ग बगल में खुदी सड़क के किनारे बने गड्ढे में जा गिरे. मैं फ़ौरन अपनी कार रोक उनके पास भागा और देखा कि स्कूटी समेत बेचारे गड्ढे के अंदर हैं किसी तरह मैंने उनको बाहर निकाला फ़िर उनकी स्कूटी को. बलिष्ठ होने का यही फायदा है कि आपको  जहाँ ताक़त दिखानी चाहिए वहां आप आसानी से ताक़त दिखा सकते हैं. गड्ढे से देखा तो भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी अब डर यह था कि कहीं भीड़ मुझे ना धुन दे? स्कूटी अकेले बाहर निकाल कर रख दी... बुज़ुर्ग अंकल को चोट  नहीं आई थी और फ़िर वो भी अपनी गलती महसूस कर रहे थे. उन्हें पूरा चौराहा पार कर के आना चाहिए था और वो सीधा ही निकल आये. अब सफारी के आगे स्कूटी वैसे भी तिल्ली लगती है दिखाई नहीं दी. और हलके टक्कर से गड्ढे की ओर मुड गए. और फ़िर मेरे जैसा नया नया एस.यू.वी. चालक (ड्राईवर) तो कुछ ना कुछ तो होना ही था. ख़ैर! भीड़ ने मुझे पहचान लिया और फ़िर मेरे ऐटीट्युड को देखते हुए ख़ुद ही दूर हो गई. 
[यह सुबह सुबह जॉगिंग करते वक़्त]

मुझे ऐसा लगता है कि बुजुर्गों को गाडी वगैरह नहीं देनी चाहिए. उनसे कंट्रोल नहीं होती है. और कोई हादसा अगर होता है तो हर हादसे में सेंट-परसेंट गलती बुजुर्गों की ही होती है, लेकिन पिटता हमेशा दूसरा ही है. मैं तो हमेशा जब भी किसी बुज़ुर्ग को सड़क पर ड्राइव करते या सड़क पार करते देखता हूँ तो ख़ुद ही रुक जाता हूँ, उन्हें पहले पार करने देता हूँ या आगे जाने देता हूँ या फ़िर सही साइड देख कर निकल लेता हूँ. कभी भी बुजुर्गों और जानवरों के सामने से गाडी नहीं निकालनी चाहिए क्यूंकि यह दोनों हमेशा आगे की ओर ही भागते हैं. 
[सफ़ेद टी-शर्ट में मेरे जिम ट्रेनर के साथ मैं लाल टी-शर्ट में]

अभी हमारे हिंदुस्तान में सरकार ने लोगों को फोर/सिक्स लेन हाई वे जैसी फैसिलिटी तो दे दी है लेकिन हाई वे पर कैसे चला जाए यह नहीं बताया है? अभी भी हाई वे पर अचानक से जानवर और साइकल वाले निकल आते हैं और ज़्यादातर जाहिल लोग अचानक से गाडी मोड़ या रोक देते हैं. जिससे कि पीछे वाले को दिक्कत होती है. अभी मेरे साथ ऐसा ही हुआ था... गोरखपुर से लौट रहा था ...हमारे कार के आगे एक और कार जा रही थी... उसकी भी स्पीड सौ के ऊपर थी और उसने अचानक से ब्रेक लगा दिया सिर्फ पान थूकने के लिए. हमारी कार उससे जा भिड़ी हमारी कार को ज़्यादा नुक्सान नहीं हुआ उल्टा उसकी कार पीछे से दब गई. वो हमसे झगड़ने लगा. मैंने उसे क़ानून और तहज़ीब सिखाया वो नहीं माना तो हर्जाना देने के बहाने मैंने उसे कार के अंदर बुला लिया और फ़िर अपने ड्राईवर से कहा कि अब कार भगा ले चलो. उसे मैंने अपनी कार में बहुत मेंटल टौरचर किया और करीब बाराबंकी के पास नब्बे किलोमीटर दूर छोड़ दिया. बेचारे को अच्छा सबक मिला होगा. इतनी देर में मैंने उसे सारे ड्राइविंग रूल्ज़ सीखा दिए थे. अब उसने तौबा कर लिया होगा कि कभी भी रौंग ड्राइविंग नहीं करूँगा और मुझे तो ज़िन्दगी भर याद करेगा और कर रहा होगा. जब हमारा कॉन्फिडेंस लेवल हाई होता है ना तो गुंडई करने का मज़ा ही अलग होता है. वैसे मेरी अंग्रेज़ी बोलने वाली पर्सनैल्टी देसी गुंडई से मैच नहीं खाती .. लेकिन यही तो मज़ा है धोखा देने में.. अब सरकार को ट्रैफिक रूल्ज़ के ऊपर भी जागरूक करते हुए टी.वी. में ऐड देना चाहिए "जागो ग्राहक... जागो". स्कूल्ज़ में एक ट्रैफिक रूल्ज़ पर भी चैप्टर या सब्जेक्ट होना चाहिए. 
[यह जहाँ मैं स्विमिंग करने जाता हूँ ... वहां का एक प्यारा दोस्त]

ऐसी आप बीतियाँ  लिखने का भी एक अलग मज़ा है. आईये ज़रा अब कविता देखते हैं. पिछले एक साल के दौरान ढेर सारी कवितायें लिखी थीं, उन्हें ही धीरे धीरे पोस्ट करता रहता हूँ. 
[लोग मुझे आत्म-मुग्ध कहते हैं... संगीता स्वरुप जी कहतीं हैं बच्चा है ही ऐसा :)... जब हमारे पास अपनी इतनी फ़ोटोज़ हैं तो गूगल से क्यूँ लें भला?]  

अखब़ार की लाचारगी...

दिन अखबार की तरह 
सुबह-सुबह रोज़ 
मेरे कमरे में आकर 
गिर जाता है और 
शाम तक 
मैं उसी पर नज़रें गडाए 
मजबूर रहता हूँ ....
वही 
घायलों की ख़बरें,
हत्याओं के समाचार ,
आवश्यकताओं के विज्ञापन 
और 
बेरोज़गारी की लाचारगी.  

(c) महफूज़ अली 

जब भी हम किसी से भी सहमत नहीं होते हैं तो वो असहमति सिर्फ हम अपने लिए ही जताते हैं. लेकिन जाहिल इन्सान इसे हमेशा दूसरों का लिया बदला ही समझते हैं. अरे! भई... हम जब भी लड़ेंगें तो सिर्फ अपने लिए ही लड़ेंगें दूसरों के लिए लड़ने सिर्फ बेवकूफ ही जाते हैं. राजनीतिज्ञ भी जब भी दूसरों के लिए लडेगा तो सिर्फ और सिर्फ अपना ही फायदा देखेगा. बिना मतलब में कोई किसी के लिए तब तक के लिए नहीं लडेगा जब तक के वो उसका कोई अपना ना हो. 

आईये अब अपना फेवरिट गाना दिखाता हूँ. 

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